महात्मा गाँधी राष्ट्रीय गामीण रोजगार गारन्टी अधिनियम (मनरेगा) का प्रभाव एवं मूल्यांकन’’ (रीवा जिले के विशेष संदर्भ में)

 

डाॅ. अवध शुक्ला1, आरती सोंधिया2

1प्राध्यापक (वाणिज्य), शा. ठा..सिंह महाविद्यालय रीवा (.प्र.)

2शोधार्थी (वाणिज्य), शा. ठा..सिंह महाविद्यालय रीवा (.प्र.)

भारत सरकार द्वारा ‘‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 पारित किया गया है। जम्मू एवं कश्मीर राज्य के अतिरिक्त यह संपूर्ण भारत में लागू है। यह अधिनियम भारत सरकार द्वारा निर्धारित किए गए दिनांक से लागू होगा। विभिन्न राज्यों अथवा राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में अधिनियम के लागू होने के दिनांक भिन्न हो सकते हैं। यह भी उपबंधित है कि अधिनियम वर्तमान में अधिसूचित जिलों तक ही सीमित रहेगा। इसे संपूर्ण क्षेत्र में अधिनियमित दिनांक से पाॅच वर्ष की अवधि में लागू किया जाएगा। प्रारंभ में अधिनियम के प्रावधानों को दो फरवरी, 2006 से विभिन्न राज्यों के 200 जिलो में लागू किया गया है।

 

मनरेगा, ग्रामीण विकास, रोजगार योजनाएँ।

 

 

प्रस्तावना

भारत सरकार द्वारा अब तक बहुत सारी जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया गया और उनका क्रियान्वयन भी हो रहा है, लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम एक ऐसी योजना है, जिसके आने से गरीब लोगों या गांव के लोगो में काम का अधिकार, आत्म सम्मान और स्वावलम्बन की भावना का विकास हुआ। इसके अलावा इस योजना से गांवों के विकास और सौन्दर्यीकरण का अच्छा अवसर मिला है।

 

 

‘‘महात्मा गंाधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम’’ (मनरेगा) भारत सरकार की अब तक की सबसे बड़ी रोजगारपरक महत्वाकांक्षी योजना है। जिसमें सम्पूर्ण भारत के गांवों की तस्वीर बदल देने की झमता विद्यमान है। आजादी के बाद से ही सरकार के समक्ष ग्रांमीण क्षेत्रो का एकीकृत विकास एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है और इसलिए तदनुरूप ग्रामीण विकास योजनायें भी बनती रही है। अभी तक दस पंचवर्षीय योजनायें पूर्ण हो गयी है। और वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) अस्तित्व में है, जिसमे ंग्रामीण विकास की व्यापक रूपरेखा खीचीं गयी है।

 

नब्बे के दशक में प्रारम्भ उदारीकरण के दौर ने ग्रामीण विकास के समक्ष नई चुनौतियों प्रस्तुत की है। भारत के समग्र विकास मे क्षेत्रीय असन्तुलन भी एक बडा रोग बना है। केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम एवं देश के समग्र विकास में गांवों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इनके प्रति अपनी वचनबद्वता व्यक्त की गयी है। और अपने अग्रभागी कार्यक्रमों में-शिक्षा तथा स्वास्थ्य के दो कार्यक्रमों के साथ शेष चार कार्यक्रमों में राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी अधिनियम, जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण योजना, राजीव गांधी पेयजल मिशन और पूर्ण स्वच्छता अभियान शामिल है। गांव के विकास की मुख्य उपादेयता ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास है। जो ग्रामीण भारत की तस्वीर के गरीबी और भूख से मुक्त कराने हेतु प्रयासरत है। इसलिए हाल के वर्षो में ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक तथा आधार युक्त संरचना के सृजन हेतु कई महत्वपूर्ण पहलकदमियाॅ भी की गयी है जिससे शहरी और ग्रामीण के बीच अन्तर मिट सके। इसी दिशा में ‘‘महात्मा गंाधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम’’ (मनरेगा) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की गयी है। मनरेगा को आरम्भ मे देश भर के 200 जिलो में 2 फरवरी 2006 को लागू किया गया और अप्रैल 2008 से देश के सभी 614 जिलो मे यह योजना लागू हो गयी। इस योजना के मद मे केन्द्र और राज्य सरकारों को योगदान क्रमशः 90 प्रतिशत 10 प्रतिशत है। इस योजना में सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना और काम के बदले अनाज योजना को समाहित कर लिया है। 2012-11 के बजट मे मनरेगा के लिए 40000 करोड़ रूपये आवंटित किये गये है, जो पिछले बजट 2009-10 की तुलना में 144 प्रतिशत अधिक है। एक लम्बे जनसंघर्ष के बाद इस विधेयक का संसद में पारित होना जन मत की एक बड़ी जीत दर्शाता है, क्योंकि काम का अधिकार भारतीय संविधान के अनु0 21 में दिये गये ‘‘गरिमा’’ के साथ जीने के अधिकार की पूर्व शर्ते है। संविधान के अनु0 45 में देश के प्रत्येक नागरिक को काम अधिकार की बात की गयी है, जो यह साबित करती है कि यह हमारा मौलिक अधिकार है। यह सशक्त लोकतन्त्र के लिए बुनियादी बाते है, कि हर हाथ मे काम दो वरना काम का दाम दो। आज वैश्वीकरण एवं निजीकरण के दौर में मजदूर-हित और इनकी गरिमा समाप्त होती जा रही थी। इस प्रकार मनरेगा सामाजिक न्याय की एक ऐसी अवधारणा है जिसके माध्यम से गरीबी मिटाने, भोजन करने का अधिकार देने, शिक्षा का अधिकार देने जैसी योजनाओं का सन्तुनल बनाने में मदद मिल रही है।ं सरकार 2014 तक गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखकर मनरेगा से भी आगे की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना लाने की तैयारी में है।

 

ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम एक अभिनव प्रयोग है जो कि जमीनी स्तर पर गरीब लोगों की मदद कर रहा है यह योजना इतनी कारगर हो रही है जिसके प्रमाण के रूप में अब रोजगार के दिनों की संख्या को 100 दिन से बढ़ाकर 200 दिन करने की मांग की जा रही है। 100 दिन के न्यूनतम रोजगार की गारंटी और इसमें भ्रष्टाचार का होना पिछली सरकार की कामयाबी ही कही जा सकती है। सरकार की इस योजना से गांव के बेरोजगार को सीधे लाभ पहॅुंचा कर इस योजना की कामयाबी साबित हो चुकी है।

 

इन्डियन-डेवलपमेन्ट फाउन्डेशन की स्टडी से पता चला है कि जिन जिलो में रोजगार गारंटी योजना लामू की गयी है, वहां खाने के सम्मान की महंगाई उन जिलों से अधिक थी जहां योजना लागू नही की गयी थी। इससे साबित होता है कि इस योजना ने ग्रामीणों की खर्च करने की ताकत दी है। Ÿार प्रदेश जैसे बड़े राज्यों से दिल्ली और मुम्बई जाने वालों मजदूरों की संख्या में निरन्तर कमी इस योजना के कारगर होने के परिणाम है। पिछले तीन सालों में 4.47 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला है।

 

सरकार की महत्वाकांक्षी योजनामनरेगाभारतीय डाकघर के पुराने गौरव को लौटने में मदद कर रही है। इस योजना के तहत कारोबारी साल 2008-2009 में डाकघरों में 3.12 करोड़ नये बचत खाते खोले गये।

 

जिला तथा खण्ड स्तर पर देश भर में 63 हजार कर्मियों को भी मनरेगा में रोजगार मिला है। देश की जनसंख्या के 40.22 करोड़ व्यक्ति मजदूर वर्ग से सम्बन्धित है, जो प्रमुखतः असंठित क्षेत्र में कार्यरत है इस वर्ग कोमनरेगाने ही सहारा दिया है।

 

शोध का उद्देश्य -

प्रस्तुत शोध पत्र ‘‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय गामीण रोजगार गारन्टी अधिनियम (मनरेगा) का प्रभाव एवं मूल्यांकन’’ पर आधारित है। इस योजना को भारत सरकार द्वारा 2005, माह-सितम्बर में पारित किया गया था। तब से लगातार इस योजना के अंतर्गत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है। इस योजना को लागू करने का मुख्य उद्देश्य सरकार द्वारा संबंधित ग्रामीण क्षेत्र का विकास करना है। अतः शोधपत्र की रचना करते समय मेरे मस्तिष्क में इसके मूल्यांकन का विचार आया। इसकी आर्थिक पृष्ठभूमि को देखते हुए शोध हेतु ‘‘रीवा जिले में ‘‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय गामीण रोजगार गारन्टी अधिनियम (मनरेगा) का प्रभाव एवं मूल्यांकन’’ 2012-17 तक का आर्थिक अध्ययन करना ही इस लघु प्रबंध का मुख्य उद्देश्य है।

 

शोध पत्र की रचना निम्नांकित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर की गई है।़

    रोजगार गारंटी योजना के दलागू होने से ग्रामीणों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना।

    मनरेगा के माध्यम से रोजगार प्राप्त परिवारों के जीवन स्तर में सुधार का अध्ययन करना।

    मनरेगा के लागू होने के बाद ग्रामीण क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति, शांति सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का अध्ययन करना।

 

उपकल्पना:

1.   रोजगार गारंटी योजना के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगो के सामान्य जीवन-स्तर एवं आय मंे सुधार हो रहा है।

2.   रोजगार गारंटी योजना के लागू होने से कई लोगो में सामाजिक तथा आर्थिक बदलाव हो रहा है।

3.   मनरेगा के कारण ग्रामीणो के पलायक मे कमी आयी है। तथा स्थानीय महौल मे काम मिल रहा है।

4.   मनरेगा के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र के निवास करने वाले प्रत्येक परिवार के वयस्क सदस्य को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध हो रहा है।

5.   मनरेगा ने गरीबो का जीवन स्तर बदल दिया है। अब वह साफ-सुथरे वातावरण में रह रहे है।

 

अध्ययन का क्षेत्र एवं शोध प्रारूप -

म्ध्यप्रदेश़ प्रांत के प्रमुख शहरों के मध्य रीवा, जो प्रस्तुत अध्ययन का क्षेत्र हैै। यह जिला 8 विकासखण्डों से घिरा है। रीवा जिले की कुल जनसंख्या (जनगणना 2011 के अनुसार) 2365106 तथा अध्ययन के उद्देश्य हेतु रीवा जिले का चयन किया। जिसमें बी.पी.एल. 6544 तथा .पी.एल. 5170 परिवार निवासरत है। अध्ययन के समय विभिन्न मोहल्लों के मध्य आर्थिक असमानता जैसा अंतर भी ज्ञात हुआ, कुछ मोहल्ले आर्थिक रूप से संपन्न तो कुछ विपन्न और कुछ मिश्रित है। इसी क्रम में कुछ मोहल्ले विशेष जाति, वर्ग एवं समुदाय की विशेषता वाले है। विभिन्नताओं को भी प्रस्तुत अध्ययन में यथोचित स्थान दिया गया है। अतः चयनित रीवा जिले से 50 परिवारों का दैवनिदर्शन विधि से चयन कर साक्षात्कार, अनुसूची के माध्यम से तथ्य संकलित किये गये।

 

शोध की आवश्यकता एवं महत्च रू.

प्रस्तावित शोध अध्ययन के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जायेगा कि ‘‘मनरेगा’’ जो कि एक महत्वूपर्ण अधिनियम एवं ग्रामीण पुननिर्माण कार्यक्रम है उसे और उसे और कैसे प्रभावी बनाया जा सकता है जिससे वह निर्धारित उद्देश्यों को पूर्ण करने में सफल हो सके। प्रस्तुत अध्ययन शोध क्षेत्र में इस बात की योगदान करेगा कि यह राष्ट्रीय कार्यक्रम किस प्रकार से प्रभावी बनाया जा सकता है।

 

शोध प्रविधि रू.

प्रस्तावित शोध अध्ययन के व्यवस्थित पूर्ण करने हेतु समकालिक, मौलिक स्त्रोतो, स्थल सर्वेक्षणों और सहायक ग्रन्थों का सूक्ष्म अध्ययन करते हुए शोध को दोनों (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) ही पद्धतियों का सहयोग लिया जायेगा। इसके साथ ही व्यक्तिगत निरीक्षण प्रश्नावली साक्षात्कार एवं अनुसूचियों का भी प्रयोग किया जायेगा।

 

समंको का संकलन एवं प्रयुक्त विधियाॅ

समंक किसी भी अध्ययन के निकाले गये निष्कर्षो के लिये आधार प्रदान करता है। समंको के मुख्यतः दो स्त्रोत है। पहला प्राथमिक स्त्रोत और दूसरा द्वितीयक स्त्रोत है। प्राथमिक स्त्रोत के अंतर्गत मुख्यतः निरीक्षण या अवलोकन, साक्षात्कार, अनुसूची प्रश्नावली के माध्यम से सूचनाएॅ एकत्र की गयी है। अपने शोध प्रवंध में प्राथमिक एवं द्वितीयक तथ्य सामग्री का प्रयोग किया है, जो कि पत्र-पत्रिकाओं, वार्षिक प्रतिवेदन अखवारों, शेाध रिपोर्ट आदि से एकत्र किया जाएगा।

प्रस्तुत शोध पत्र रोजगार गारंटी योजना (रीवा) की आर्थिक स्थिति एवं आय-व्यय पर आधारित है। अतः तथ्यात्मक विश्लेषण के लिये इस अध्ययन में द्वितीयक समंको का प्रयोग किया जाएगा। समंको का मुख्य स्त्रोंत जिला पंचायत द्वारा प्रकाशित वार्षिक प्रतिवेदन के आय-व्यय पत्रक 2006-2017 तक के आॅकडे़, जिला पंचायत कार्यालय, एवं अन्य सूचनात्मक पत्रिकाएॅ है। ये वार्षिक विवरण तथा अन्य प्रकाशित सामग्री जिला पंचायत रीवा के कार्यालयों से व्यक्तिगत सम्पर्क करके एकत्रित की जाएगी।

तथ्यों के विश्लेषण द्वारा आवश्यक निष्कर्ष प्राप्त किये जायेंगे एवं निष्कर्षो के आधार पर आवश्यक सुझाव भी प्रस्तुत किये जायेगें।

 

 

उपरोक्त तालिका में तालिका के अनुसार सर्वाधिक 50 प्रतिशत 30 से 40 वर्ष आयु वर्ग के उत्तरदाता है तथा न्यूनतम 10 प्रतिशत 40 से अधिक आयु वर्ग के हैं। 40 प्रतिशत उत्तरदाता 20 से 30 आयु वर्ग के हैं। अतः स्पष्ट है कि 30 से 40 आयु वर्ग के उत्तरदाता होनें का प्रमुख कारण पारिवारिक जिम्मेदारियों का होना, इसके आधार पर कहा जा सकता है ज्यादातर ये उत्तरदाता परिवार के मुख्य सदस्य हैं।

 

 

उपर्युक्त तालिका में सर्वाधिक रीवा जिले में कार्य करने वाले पुरूष 85 प्रतिशत है। एवं महिलाएं मात्र 15 प्रतिशत है।

 

स्पष्ट है कि आज भी महिलाएं कार्य प्राप्त करने में पीछे है।

 

 

उपर्युक्त तालिका में जाति के आधार पर वर्गीकरण दिखाया गया है। जिसमें हरिजन के सबसे अधिक 76 प्रतिशत एवं सबसे कम पिछड़ा जाति 10 प्रतिशत है तथा सामान्य व्यक्तियों का प्रतिशत शून्य है।

 

रीवा जिले में हरिजन जाति के सर्वाधिक लोग कार्य करते पाये गये हैं।

 

 

 

उपर्युक्त तालिका में उत्तरदाताआंे की शिक्षा का वर्णन है। जिसमें 10 प्रतिशत प्राथमिक, 8 प्रतिशत माध्यमिक, 2 प्रतिशत हाईस्कूल तथा शेष 80 प्रतिशत अशिक्षित हैं।

 

उत्तरदाताओं में शिक्षा जागरूकता का अभाव पाया गया है क्योंकि अधिकांश उत्तरदाता निरक्षर हैं। कुछ तो केवल साक्षर मात्र हैं।

 

 

उपर्युक्त तालिका में आवास के प्रकार का वर्गीकरण दिखाया गया है जिसमें कच्चे आवास 70 प्रतिशत, पक्के मकानो का प्रतिशत शून्य है और मिश्रित मकानों का प्रतिशत 30 है।

 

उत्तरदाताओं में मकानों का सबसे ज्यादा प्रतिशत कच्चे मकानों का है क्योंकि सभी उत्तरदाताओं का मुख्य व्यवसाय मजदूरी है और वे इतनी बचत नहीं कर पाते जिससे वे व्यवस्थित मकान बना सके। जिन उत्तरदाताअें के मकान मिश्रित हैं उन्हें इन्दिरा आवास योजना के लाभ के तहत बनें है।

 

 

उपर्युक्त तालिका में आवास के श्रोतों का विवरण दिया गया है। जिसमें कृषि 20 प्रतिशत, मजदूरी 70 प्रतिशत, एवं दोनों तहत प्राप्त आय 10 प्रतिशत हैं।

उत्तरदाताओं के मुख्य आय का साधन मजदूरी है क्योंकि इन उत्तरदाताओं के पास जोतों का अभाव है उत्तरदाताओें के पास अधिक से अधिक 2 बीघा जमीन ही है।

 

निष्कर्ष:-

    रीवा जिले में सर्वाधिक कार्य पुरूषों ने प्राप्त किया।

    रीवा जिले में सर्वाधिक पिछडी जाति के लोगों ने काम प्राप्त किया।

    योजना में कार्यरत उत्तरदाताओं मंे शिक्षा का अभाव पाया गया।

    रीवा जिले में कार्यरत अधिकांश लोग कच्चे मकानों में निवास करते हैं।

    रीवा जिले में कार्यरत अधिकांश लोगों की आय 1500 से 2000 के बीच है।

    योजना में कोरी जाति के सर्वाधिक लोग कार्यरत है।

    योजना में कार्यरत उत्तरदाता सामान्यतः सामान्य भोजन करते है।

    योजना में सामान्य आर्थिक स्थिति के लोग कार्यरत है।

    रीवा जिले में कार्य करने से आपसी एकता में वृद्वि हुई है।

    रीवा जिले में कार्य मिलने से आर्थिक बोझ कम हुआ है।

    रीवा जिले के क्रियान्वयन से गांव की सामाजिक, आर्थिक स्थिति में परिवर्तन हुआ।

    रीवा जिले में कार्यरत 64 प्रतिशत लोगों को 100 दिन का रोजगार प्राप्त हुआ।

    योजना के क्रियान्वयन से पलायन में कमी आयी है।

    रीवा जिले से पारिवारिक ग्रामीण सम्बन्धों में सुधार हुआ है।

 

सुझावः-

    रोजगार गारण्टी योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए इसमें और अधिक व्यवहारिकता की आवश्यकता है।

    रीवा जिले में समय से मजदूरी के भुगतान की आवश्यकता है।

    राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना में महिलाओं केा कार्य करने क्रे लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता हैै।

    इस योजना के उचित अंकेक्षण एवं मूल्यांकन को दृष्टिगत रखते हुए ग्रामीण सहभागिता की आवश्यकता है।

    बेरोजगारी भत्ता के समय से भुगतान की आवश्यकता है।

    स्थानिय स्तर में योजना में पारदर्शिता का अभाव है योजना की कार्य प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

    योजना की भाषा समझ पाने वाले के लिए मुख्य धाराओंका प्रकाशन सरल एवं स्थानिय भाषा में हो।

    कार्य करने से पहले इस योजना की पर्याप्त जानकारी की आवश्यकता है, पंचायत स्तर पर इसका अभाव है।

    इस योजना में और अधिक सुधार की जरूरत है। इसके क्रियान्वयन, जाॅबकार्ड, प्रविष्टियां इत्यादि स्पष्ट हो।

    रीवा जिले में प्राप्त कार्य दिवसों में वृद्धि की आवश्यकता है।

    ऐसे प्रयास शासकीय स्तर पर किया जाये जिसके अन्तर्गत प्रावधानों की मानीटरींग और मूल्यांकन मतदाताओं द्वारा समय-समय पर किया जाये इस निरंकुशता की प्रवृति से बचा जा सकता है।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूचीरू.

1.   मुखर्जी रवीन्द्रनाथ, 2014 सामाजिक शोध सांख्यिकीय विवेक प्रकाशक जवाहर नगर दिल्ली

2.   शास्त्री राजाराम, 2012 समाज कार्य, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ

3.   हरमैन काइनर, दि युनाइटेड नेशन इकानामिक्स एण्ड सोशल काउसिंल, वल्र्ड पीस फाउडेशन न्यूयार्क, 1961

4.   सेन्ट्रल सोशल वेलफेयर बोर्ड रिपोर्ट आॅफ दि एडवाइजरी कमेटी आन आउटर केयर प्रोग्राफ नई दिल्ली, 1955

5.   प्लानिंग कमीशन सोशल वेलफेयर इन इण्डिया, गवर्नमेंट पब्लिकेशन, दिल्ली-6-1955

6.   सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली 2008-2013

7.   मनरेगा-वार्षिक प्रतिवेदन 2008-2015, ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार नई दिल्ली

8.   जिला सांख्यिकी पुस्तिका जिला -रीवा, 2012, 2013

 

 

Received on 02.06.2019            Modified on 14.06.2019

Accepted on 23.06.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):525-530.